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Tuesday, September 1, 2009

एक जाबांज और दिलेर साथी है शमीम मोदी


शमीम और उनका संघर्ष उन कई हजारो बेजुबान मजदूरों और आदिवासियों की लडाई है जिनका प्रितिनिधित्व उनका श्रमिक आदिवासी संघटन करता है. शमीम और उनकी लडाई को जानने के पहले हमें शमीम को जानना जरुरी है.

आखिर कौन है ये शमीम मोदी
जो शमीम को नहीं जानते उनके लिए यह एक और दूसरा नाम हो सकता है पर मध्यप्रदेश के उन हजारो वाशिंदों के लिए शमीम और उनके पति अनुराग मोदी कोई अनजाना नाम नहीं है. ये वो लोग है जिनके साथ मिलकर उन्होंने अपने हक की न जाने कितनी लड़ईया लड़ी है.
शमीम मोदी और उनके पति अनुराग मोदी श्रमिक आदिवासी संगठन नामक संगठन के समर्पित कार्यकता है. उनका संगठन मध्यप्रदेश के बैतूल, हरदा और समीपवर्ती जिलो में काम करता है. उनके संघर्ष के केंद्र में सैकडो मजदूर, आदिवासी मिलमजदूर है जो वर्षो से शोषित रहे है और जिनका सिस्टम में कोई वजूद नहीं है. ऐसे हजारो दबे कुचले लोगो के मजबूत आवाज़ है शमीम दीदी.
अपने काम और जाबांज व्यक्तित्व के कारन शमीम कई मुसीबतों में फंस चुकी है और चूंकी उनकी लडाई सीधे भ्रष्ट नेताओ और अधिकारिय के खिलाफ रही है इसलिए कोई शक नहीं है की शमीम को कई बार जान से मार देने की धमकी दी जा चुकी है.
शमीम के काम को इस बात से समझा जा सकता है की इसी साल मध्य प्रदेश सरकार ने फरबरी में शमीम को जेल में बंद कर दिया था और उन्हें जमानत भी नहीं दी गयी थी. इससे पहले मध्यप्रदेश के लगभग ८ जिलो से भी शमीम को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था.

२३ जुलाई का वो काला दिन
इसी साल पिछली २३ जुलाई को हमारे सभ्य समाज के शर्मसार कर देने वाली यह घटना घटित हो गयी जिसने देश के सारे जनवादी आन्दोलन और उससे जुड़े हर शख्स के न केवल अन्दर तक हिला दिया बल्कि एक हद तक यह सोचने पर भी मजबूर कर दिया की हमारे देश की आर्थिक राजधानी कितनी सुरक्छित है.
इसी दिन जब शमीम अपने वसई(मुंबई) स्थित घर पर थी तभी उन पर जानलेवा हमला किया गया, इस हमले का मकसद वैसे तो उन्हें पूरी तरह से ख़तम कर देने का था परन्तु अपनी सूझ-बूझ के बल पर शमीम अपनी जिन्दगी बचने में कामयाब हो गयी. इस दिल दहला देने वाली घटना में न तो कोई लूट-पट अंजाम दी गयी न ही शमीम से किसी जोरजबर्दस्ती की कोशिश की गयी. हमलावर का केवल एक और एक ही मकसद था और वो था शमीम की मौत.
सबसे अचरज में डालने वाली बात ये है की हामलावर और कोई नहीं बल्कि शमीम की ही हाऊसिंग सोसाइटी का चौकीदार था जिसका शमीम के परिवार से बहुत अच्छा सम्बन्ध था. परिवार के विश्वास के कारन ही ये शख्स इस घटना को अंजाम देने में कामयाब हो पाया.

पुलिस और मीडिया
जनवादी आन्दोलन और एक्टीविस्ट हमेशा से ही पुलिस और सरकारी मशीनरी से दो-दो हाथ करते रहे है और पुलिस तो वैसे भी सरकार का औजार है जिसका मनमाना उपयोग सरकारे करती रही है. ऐसे तंत्र से वैसे भी किसी सुप्पोर्ट की उम्मीद करना बेकार था, और पुलिस की कार्यवाही की दशा एवं दिशा ने इस आशंका को सिध्ध कर दिया. केस की शुरुआत से ही पुलिस ने अपना जाना मन दुलमुल रवैया अपनाना शुरू किया और अपनी जगजाहिर छवि में सुधर के कोई कोशिश नहीं की.
बरहाल इसका हमें कोई मलाल नहीं है उन्होंने वाही किया जिसकी उनसे उम्मीद थी पर जो अप्र्तायाषित था वो में अब बयां करने जा रहा हूँ.
अमूमन लोगो ससे जुड़े हुए सन्घर्ष और इन संगर्शो में अपने को खपा देने वालो को मीडिया के रूप में उनकी लडाई मीक विश्वस्त साथी मिला है. पिछले दशक में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के उदय के बाद तो इस पूरे प्रयास में एक नयी जान आ गयी है. अब तो यहाँ तक मह्स्सोस किया जाने लगा था जैसे मीडिया लोगो के संघर्षो की सहयोगी न होकर उनका एक हिस्सा ही है. पिछले दशक के हर बड़े जनान्दोलनों में मीडिया की जबरदस्त दखल रही है. पर इतना गहरा जुडाव होने के बाद भी शमीम पर हमले के मामले में यदि किसी ने सबसे ज्यादा निराश किया तो वह मीडिया ही है.
आम लोगो की लडाई के शमीम जैसे सिपाही को चन अंगरेजी अखबारों को छोड़कर कही जगह नसीब नहीं हुई. मीडिया की उदासीनता के चलते ही पुलिस अपनी टालमटोल की राजनीती करती रही और पुरे केस को कमज़ोर करने की साजिश करती रही.
कुल्ज़मा मीडिया और उनसे जुड़े हर पहलू ने इस गंभीर लडाई और वक़्त में शमीम का साथ नहीं दिया और साथ ही उन हजारो लोगो के साथ गहरा विश्वासघात किया जिनकी लडाई शमीम के साथ ही ख़तम हो जाती.
मीडिया और मीडिया कर्मीयों से हमें और सहयोग और जगह की अपेक्षा थी , उसका जनवादी चेहरा इस नाकामयाबी से मलिन तो हो ही गया है.

आखिर में
शमीम मौत के मुह से बहार आ गयी है और उन सभी को बेनकाब करने के करित्संकल्पित है जिन्होंने उन्हें जान से मरने की इस घिनौनी सजिज़ को रचा था.
उनकी इस लडाई उनके संघर्ष का हर साथी और देश का हर जनांदोलन शामिल हो गया है. और हमें इंतजार है की देश का तथाकथित जागरूक मीडिया इस कुम्भ्करनी नींद से जाग जाये और शमीम को न्याय दिलाने की अपनी जबाबदारी को सजगता से निभाए.
अभी के लिए तो शमीम और अनुराग की मांग इस केस में सीबीआई जाँच की है ताकी असली चेहरों को बेनकाब किया जा सके.
शमीम मोदी टाटा सामाजिक विज्ञानं संसथान, मुंबई में फकुल्टी के रूप में भी जुडी हुई है.
हम उनके बेहतर स्वाश्थ्य की कामना करते है तथा साथ ही उनके संघर्ष के दीर्घायु होने की कामना करते है.
आप अकेली नहीं है शमीम सारा देश आपके साथ

Wednesday, July 8, 2009

विकास और बुंदेलखंड

विकास और बुंदेलखंड दो ऐसे पूरक शब्द है जिनका मिलन शायद ही किसी बुन्देलखंडी ने कभी महसूस किया होगा। और मजे की बात यह है की देश के केन्द्र में होते हुए भी, इस देश की तथाकथित विकासोन्मुखी मीडिया और अन्य सारे सर्मायाबदारो की मौजूदगी में आज तक बुंदेलखंड का नेगेटिव डेवेलोपमेंट कोई खास राष्ट्रीय पहचान नही बना पाया है ।
क्या बात है की अल्पविकास के सारे पैमानों को पुरा करने के बाद भी बुंदेलखंड देश के स्तरपर सहानुभूति पैदा करने में असफल रहा है ।
क्या एक समाज के रूप में हमारी कोई पहचान नही है या फ़िर कोई और बड़ा षडयंत्र काम कर रहा है ?
इस गंभीर और समसामयिक प्रशन का जबाब तलाशने की एक जबरदस्त जरूरत है ताकि कम से कम इस बात की पड़ताल की जा सके की
क्यो बुंदेलखंड या बुंदेलखंड का विकास राष्ट्रीय स्तर पर एक पहचान नही बना पाया है ?
यह एक बहुत गंभीर मासला है
और
आपकी आवाज और राय बहुत जरूरी है एक बुन्देलखंडी के नाते
एक बेहतर नए बुंदेलखंड के लिए

Monday, November 17, 2008

चुनावी माहोल में बुंदेलखंड और विकास

मध्य प्रदेश गजब के चुनावी महल में सिमटता जा रहा है , हर कोई सिर्फ़ चुनाव और चुनाव के बाद के परिणामो के बारे में सोच रहा है या अंदर ही अंदर कुछ बुन रहा है ।
पिछली बार बुंदेलखंड के लिए कुछ खास था क्योकि हमारी भूमि की ही एक बेटी पहली बार मद्य प्रदेश के मुख्या मंत्री की कुर्सी को सुशोबित करने जा रही थी, बरसो से बुंदेलखंड की धरती को एक अदद नेता जिसका प्रदेश और राष्टीय इस्टर पर दबदबा हो तलाश थी।
उमा भरी ने वह करिश्मा कर दिक्हया पर इस बार क्या है बुंदेलखंड और विकास के लिए इन चुनावो में\
गंबीर पड़ताल के साथ कल जुड़िये , विचार सदर आमंत्रित है

Thursday, June 19, 2008

बुदेलखंड और बुन्देलखंडी

बुदेलखंड और बुन्देलखंडी
बुंदेलखंड आजकल सिर्फ अपने पिछड़ेपन और अलग राज्य की मांग को लेकर चर्चा में है, पर क्या सिर्फ इसीलिए ही बुदेलखंड की बात की जा सकती है. नहीं और भी मुद्दे है जिन्होंने वर्षो से मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के बीच बटे हुए इस भूखंड की राजनितिक अस्मिता को जिन्दा रखा है. यह इतिहास की बानगी है की १८५७ की क्रांति क रक्तबीज यही बोया गया और रानी झाँसी की भी यही कर्म भूमि है. दुर्गावती की शौर्य गाथाये हो ईसुरी की रसभरी फागे, छत्रसाल की कर्मभूमि हो या बाजीराव - मस्तानी के अमर प्रेम की भूमि. सबकुछ बुंदेलखंड ही है. बुंदेलखंड एक विचार है, एक सांस्कृतिक आन्दोलन है कोई राजनितिक अखाडा नहीं है ।
दरअसल पिछले pअच्हस सालो में पैदा हुए राजनीतीक शून्य और घोर गरीबी पिछडेपन के कारन यहाँ के लोग कभी खाने कमाने की बातो से उपर उठाकर सोच ही नही पाए और इनके मुकाबले देश के अन्य हिस्सों के लोगो ने लोकतंत्र में मिली बार्गेनिंग का भरपूर लाभ उठाया। इसा नही है की यहाँ के लोग कोई विकास वीरोधी है पर जिस देश में बिना मांगे कुछ नही मिलता उसमे उनकी दबी कुचली और निरीह आवाज को सुनता भी कौन और हकीकत में किसी ने सुना भी नही gaya ।
बुंदेलखंड की दिल्ली से भोगोलिक दूरी भले ही कुछ कम लगे पर सच्चाई में अभी भी यहाँ के लोगो के लिए अबी दिल्ली काफी दूर है ।
इस ब्लॉग के माध्यम से मेरी यही कोशिश है और रहेगी की देश दुनिया में फैले तमाम बुंदेलखंडइयो तक इस छेत्र की असली तस्वीर पहुचाई जाए साथ उन तमाम लोगो को , उन सभी लोगो का इके अलग पर्सपेक्टिव दिखाया जाए जो बुदेलखंड की बात में शामिल है इतेफाक रखते है।
एक बात और - में या मेरा ब्लॉग किसी भी रूप में अलग बुन्देलखंड रअजय की लिए चल रहे मउव्मेंट का हिस्सा नही है। वो एक मुद्दा है जिस पर हमारी पैनी नजर है।
आजे से बुन्देलखंड की हर बात आपके इस बुन्देलखंडी के साथ जरी रहेगी।
शुक्रिया और शब्बा खैर।